छत्तीसगढ़

राजनीति का अखाड़ा बना जनपद पंचायत राजनंदगांव

ग्राम पंचायत के साथ भेदभाव कर रहे जनप्रतिनिधि

एक ही जनपद – दो विधानसभा, एक पास तो दूसरा फेल!

राजनांदगांव। जनपद पंचायत राजनांदगांव इन दिनों विकास का केंद्र कम और राजनीति का अखाड़ा ज्यादा नज़र आ रहा है। हालात ऐसे हैं मानो पंचायतें विकास कार्यों का नहीं बल्कि सत्ता संघर्ष का दंश झेल रही हों।

राजनांदगांव विधानसभा के 40 ग्राम पंचायतों में लाखों रुपए के विकास कार्य स्वीकृत कराए जा रहे हैं, वहीं उसी जनपद में आने वाले डोंगरगढ़ विधानसभा के 60 से ज्यादा पंचायतें काम के लिए तरस रही हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर पंचायतें विधायक और सांसद की पसंद-नापसंद पर क्यों निर्भर हों? पंचायत की गली-गली राजनीति का शिकार क्यों बने?

2021-22 का खनिज लायल्टी मद अब तक पंचायतों तक नहीं पहुंचा। डीएमएफ (डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड) का पैसा भी डोंगरगढ़ की पंचायतों को नसीब नहीं हुआ। साफ है कि सत्ता की रस्साकशी का खामियाजा गांव के गरीब जनता और सरपंच भुगत रहे हैं।

डोंगरगढ़ के सरपंचों की नाराज़गी काबिलेगौर है। उनका आरोप है कि सांसद और पूर्व सांसद बदले की भावना से पंचायतों की अनदेखी कर रहे हैं। डॉ. रमन सिंह के क्षेत्र की पंचायतें “प्रगति” पर हैं तो डोंगरगढ़ की पंचायतें “दुर्गति” झेल रही हैं। क्या यही लोकतंत्र है? जहां एक ही जनपद में एक विधानसभा “पास” और दूसरा “फेल” घोषित कर दिया जाए?

सच्चाई यह भी है कि जनपद और जिला पंचायत सदस्य सब कुछ जानते हुए भी तमाशबीन बने हुए हैं। अधिकारी बंधे हुए हैं, और सरपंच कमिशनखोरी की दलदल में फंसने से डर रहे हैं। विकास कार्यों से ज्यादा जोर इस बात पर है कि किसका विधायक किस दल से है।

आज ज़रूरत है कि पंचायतों को राजनीतिक खेमेबाज़ी से मुक्त किया जाए। गांव की सड़क, नाली, तालाब और बिजली-पानी को विधायक और सांसद की पार्टी लाइन पर क्यों बांटा जा रहा है? क्या विकास अब वोट बैंक की बंधक बनकर रह जाएगा?

राजनांदगांव जनपद पंचायत में जो खेल चल रहा है वह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। यह भेदभाव नहीं रुका तो आने वाले समय में जनता जवाब देगी। क्योंकि जनता को चाहिए विकास, न कि सत्ता के रंगमंच पर खेला जाने वाला यह विधानसभा का खेल।
निचोड़ यही है – विकास अगर भेदभाव का शिकार होगा तो लोकतंत्र मज़ाक बनेगा और पंचायतें राजनीति की कैदी।

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