हाईकोर्ट में बच्चों की दर्दभरी कहानी सुन भावुक हुई बेंच: कहा- ‘हम बंदी नहीं, यहां सुरक्षित हैं’, फिर आया बड़ा फैसला

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा खुलासा हुआ, जिसने अदालत को भी गंभीर फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। भाई-बहन ने कोर्ट के सामने अपनी आपबीती सुनाते हुए जो सच बताया, उसके बाद अदालत ने दोनों बच्चों को फिलहाल बाल संप्रेक्षण गृह में ही सुरक्षा के साथ रखने का अंतरिम आदेश जारी किया है।
मामले की सुनवाई के दौरान बच्चों ने अदालत से साफ कहा कि उन्हें किसी ने बंदी बनाकर नहीं रखा है, बल्कि बाल संप्रेक्षण गृह में वे पूरी तरह सुरक्षित हैं।
दुष्कर्म के आरोप ने बदल दिया पूरा मामला
सुनवाई के दौरान नाबालिग बच्ची और उसके भाई ने अदालत के सामने बताया कि उनकी सौतेली बहन के पति ने बच्ची के साथ तीन बार दुष्कर्म किया था। बच्चों के इस बयान के बाद अदालत ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया।
कोर्ट को बताया गया कि इस मामले में पुलिस थाने में प्राथमिकी पहले ही दर्ज की जा चुकी है और आरोपी फिलहाल फरार है। बच्चों के बयान और अन्य तथ्यों की पुष्टि होने के बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया।
महिला ने बच्चों को अवैध रूप से बंदी बनाने का लगाया था आरोप
जानकारी के अनुसार सरगुजा क्षेत्र की रहने वाली एक महिला ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। महिला का आरोप था कि उसकी नाबालिग सौतेली बहन और भाई को अवैध तरीके से रोककर रखा गया है।
महिला ने अदालत से बच्चों को अपनी सुपुर्दगी में देने की मांग की थी। याचिका में बच्चों की देखरेख कर रही समाज सेविका और महिला एवं बाल संप्रेक्षण गृह के अधिकारियों को भी पक्षकार बनाया गया था।
कोर्ट ने बच्चों को बुलाकर जानी सच्चाई
मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि बच्चों को बंदी नहीं बनाया गया है। उनकी सुरक्षा और कानूनी संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उन्हें बाल संप्रेक्षण गृह में रखा गया है।
इसके बाद अदालत ने वस्तुस्थिति स्पष्ट करने के लिए दोनों बच्चों को कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया। पुलिस सुरक्षा के बीच बच्चों को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच के सामने प्रस्तुत किया गया।
अदालत ने बच्चों की सुरक्षा को माना सबसे जरूरी
बच्चों की पूरी बात सुनने और तथ्यों की पुष्टि होने के बाद अदालत ने याचिकाकर्ता महिला की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने बच्चों को उसकी सुपुर्दगी में देने से साफ इंकार कर दिया और उन्हें फिलहाल बाल संप्रेक्षण गृह में ही रखने का आदेश दिया।
अदालत ने मामले से जुड़े सभी तथ्यों को रिकॉर्ड में शामिल करते हुए प्रतिवादी समाज सेविका को जवाब पेश करने के लिए समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 जून को होगी।




