छत्तीसगढ़

22 साल से संतान का इंतजार, उम्र बनी कानून की दीवार तो हाई कोर्ट ने दिखाई राह, दंपती को IVF की मिली अनुमति

 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने संतान की चाह रखने वाले एक दंपती को बड़ी राहत दी है। शादी के करीब 22 साल बाद IVF के जरिए माता-पिता बनने की उम्मीद जगी, लेकिन पति की उम्र तय कानूनी सीमा से अधिक होने के कारण क्लिनिक ने इलाज से इनकार कर दिया। इसके बाद दंपती ने न्यायालय की शरण ली।मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने की। कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए दंपती को IVF प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति देने का रास्ता साफ किया।

22 साल बाद जगी थी उम्मीद

मामला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले से जुड़ा है। दंपती की शादी को करीब 22 साल हो चुके हैं, लेकिन अब तक उनके घर संतान नहीं हुई। लंबे इंतजार के बाद दोनों ने IVF तकनीक के जरिए माता-पिता बनने की योजना बनाई।पत्नी की उम्र 47 साल और पति की उम्र 57 साल है। जब दोनों इलाज के लिए पहुंचे तो पति की उम्र कानूनी प्रावधानों के तहत अड़चन बन गई।

कानून की उम्र सीमा बनी सबसे बड़ी बाधा

भारत मे IVF और प्रजनन संबंधी उपचार को ART Act तथा Surrogacy Act के तहत नियंत्रित किया जाता है। दंपती के मामले मे पति की उम्र 55 साल की निर्धारित सीमा से दो साल अधिक थी।इसी वजह से संबंधित क्लिनिक ने IVF प्रक्रिया आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। लंबे समय से संतान की उम्मीद लगाए बैठे दंपती के सामने अब इलाज का रास्ता बंद होता नजर आया। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने महिला के अधिकार को माना अहम

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला की स्थिति और उसकी इच्छा को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि यदि महिला शारीरिक और मानसिक रूप से गर्भधारण के लिए सक्षम है और वह संतान चाहती है, तो केवल पति की उम्र अधिक होने के आधार पर उसे मां बनने के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने इस मामले मे उम्र से जुड़े प्रावधान को महिला के मातृत्व के अधिकार के रास्ते मे बाधा नहीं बनने दिया।

क्लिनिक को IVF की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति

हाई कोर्ट के आदेश के बाद दंपती के लिए IVF उपचार का रास्ता खुल गया है। अदालत ने संबंधित क्लिनिक को प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति देने का निर्देश दिया है।करीब 22 साल के इंतजार के बाद मिले इस आदेश ने दंपती के लिए माता-पिता बनने की उम्मीद फिर जगा दी है। यह मामला प्रजनन उपचार, कानूनी उम्र सीमा और महिला के प्रजनन अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Related Articles

Back to top button