छत्तीसगढ़

Shardiya Navratri 2026: 18 या 19 अक्टूबर, कब होगा दुर्गा अष्टमी पर कन्या पूजन? जानें तिथि और शुभ समय

 Shardiya Navratri 2026:  शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दौरान महाष्टमी और महानवमी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इन दोनों तिथियों पर कई परिवारों में कन्या पूजन किया जाता है। वर्ष 2026 में दुर्गा अष्टमी की तारीख को लेकर असमंजस बना हुआ है। कुछ लोग 18 अक्टूबर को अष्टमी मनाने की बात कर रहे हैं, जबकि कुछ के अनुसार यह पर्व 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। ऐसे में तिथि और पूजा की परंपरा को समझना जरूरी है।

18 अक्टूबर के बजाय 19 अक्टूबर को क्यों मनाई जाएगी महाष्टमी?

दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर 2026 को सुबह 8 बजकर 27 मिनट पर शुरू होगी और 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर समाप्त होगी। 18 अक्टूबर को सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि रहने के कारण उदया तिथि की गणना के आधार पर दुर्गा अष्टमी 19 अक्टूबर को मनाई जाएगी।हालांकि, व्रत और पर्व की तिथि निर्धारित करने में स्थानीय पंचांग और धार्मिक परंपराओं की भी भूमिका हो सकती है। इसलिए पूजा का अंतिम निर्णय लेने से पहले अपने क्षेत्र के पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करना उचित रहेगा।

अष्टमी और नवमी पर कब करें कन्या पूजन?

जो भक्त अष्टमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, वे 19 अक्टूबर को अष्टमी तिथि के दौरान पूजा कर सकते हैं। वहीं, नवमी के दिन कन्या पूजन की परंपरा निभाने वाले भक्त नवमी तिथि के अनुसार अनुष्ठान कर सकते हैं।कन्या पूजन का सटीक शुभ मुहूर्त स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए पूजा शुरू करने से पहले अपने शहर के अनुसार समय की जानकारी अवश्य लें।

संधि पूजा का भी है विशेष महत्व

महाष्टमी और महानवमी के संधिकाल को संधि पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट का समय होता है। इस दौरान मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। संधि पूजा का सटीक समय तिथि परिवर्तन और स्थानीय समय के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

कन्या पूजन में कितनी कन्याओं को कराया जाता है भोजन?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कन्या पूजन में छोटी बच्चियों को मां दुर्गा के स्वरूप के रूप में पूजने की परंपरा है। कई परिवारों में दो से दस वर्ष तक की नौ कन्याओं को भोजन कराया जाता है। उनके साथ एक बालक को लांगुर या भैरव के प्रतीक के रूप में भोजन कराने की परंपरा भी प्रचलित है।पूजन के बाद कन्याओं को दक्षिणा, उपहार या अन्य भेंट देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। यह अनुष्ठान श्रद्धा, सम्मान और सेवा भाव से जुड़ा माना जाता है।

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