छत्तीसगढ़

गरीबी से जूझ रही 14 महिलाओं ने बनाया समूह, सावित्री ने मशरूम और दुग्ध उत्पादन से बदली परिवार की तस्वीर; 85 हजार से 2.38 लाख पहुंची सालाना आय

 महासमुंद। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को संगठित कर उन्हें रोजगार और आमदनी के साधन उपलब्ध कराने की कोशिश अब कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बदल रही है। महासमुंद जिले के बसना विकासखंड के ग्राम पलसाभाड़ी की सावित्री पटेल की कहानी भी इसी बदलाव को सामने रखती है। कभी सीमित आमदनी में परिवार चलाने वाली सावित्री ने स्व सहायता समूह से जुड़ने के बाद मशरूम उत्पादन, गाय पालन और दुग्ध व्यवसाय को अपनी आजीविका का आधार बनाया। इन प्रयासों से उनके परिवार की वार्षिक आय करीब 85 हजार रुपए से बढ़कर 2 लाख 38 हजार रुपए तक पहुंच गई।

14 महिलाओं ने मिलकर शुरू की नई राह

ग्राम पंचायत खोगसा के आश्रित ग्राम पलसाभाड़ी में 17 अप्रैल 2018 को 14 महिलाओं ने मिलकर भवानी महिला स्व सहायता समूह का गठन किया था। समूह में शामिल सभी महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से थीं और घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित थीं।ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान के तहत आयोजित सीआरपी चक्र के दौरान सीआरपी दीदियों ने महिलाओं को समूह गठन, नियमित बचत, ऋण सुविधा और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी। महिलाओं को जब सामूहिक प्रयास के जरिए आय बढ़ाने की संभावनाओं का पता चला तो उन्होंने एक साथ आगे बढ़ने का फैसला किया।

पूंजी की कमी बनी थी सबसे बड़ी चुनौती

समूह बनने के बाद सावित्री पटेल ने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए मशरूम उत्पादन शुरू करने का निर्णय लिया। उनके घर में काम के लिए पर्याप्त जगह थी, लेकिन व्यवसाय को शुरू करने के लिए शुरुआती पूंजी उपलब्ध नहीं थी। ऐसे समय में बिहान योजना के माध्यम से मिलने वाली आर्थिक सहायता उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।स्व सहायता समूह को आरएफ और सीआईएफ के जरिए मिली राशि तथा बैंक लिंकेज से प्राप्त वित्तीय सहयोग का इस्तेमाल आजीविका गतिविधियों को आगे बढ़ाने में किया गया। सावित्री ने मशरूम उत्पादन के साथ गाय पालन और दूध बिक्री का काम भी शुरू कर दिया।

85 हजार की आय अब 2.38 लाख रुपए सालाना

अलग-अलग आजीविका गतिविधियों से जुड़ने का सीधा असर सावित्री के परिवार की आमदनी पर पड़ा। उनके अनुसार समूह से जुड़ने से पहले परिवार की सालाना आय करीब 85 हजार रुपए थी। मशरूम उत्पादन, पशुपालन और दुग्ध व्यवसाय को अपनाने के बाद यह आय बढ़कर लगभग 2 लाख 38 हजार रुपए वार्षिक हो गई।आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ परिवार की जरूरतें पूरी करना भी आसान हुआ है। सावित्री के मुताबिक अब बच्चों की उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च, घरेलू जरूरतों और परिवार के भरण-पोषण के लिए पहले जैसी आर्थिक परेशानी नहीं रहती।

समूह से मिला आर्थिक सहारा, बढ़ा आत्मविश्वास

सावित्री के लिए स्व सहायता समूह केवल वित्तीय मदद का जरिया नहीं रहा, बल्कि इसने उन्हें अपने दम पर आगे बढ़ने का भरोसा भी दिया। ग्राम संगठन से प्राप्त राशि का भुगतान भी समय से पहले ब्याज सहित किया जा रहा है।बिहान से जुड़ने के बाद सावित्री ने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि सही वित्तीय सहयोग और आजीविका का अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती हैं। उनका सफर अब गांव की दूसरी महिलाओं के लिए भी स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने की मिसाल बन रहा है।

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