छत्तीसगढ़

हाईकोर्ट की दो टूक: विभागीय अफसरों पर निजी वित्तीय देनदारी नहीं डाल सकता निष्पादन न्यायालय

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मध्यस्थता अवॉर्ड की राशि की वसूली से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निष्पादन न्यायालय किसी सरकारी विभाग के अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय देनदारी नहीं डाल सकता, यदि मूल मध्यस्थता अवॉर्ड में उनके खिलाफ ऐसी कोई व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की गई है।

जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों के खिलाफ दिए गए ऐसे निर्देशों को निरस्त कर दिया, जिनमें उनसे व्यक्तिगत शपथपत्र और अंडरटेकिंग मांगी गई थी। भुगतान में देरी होने पर अधिकारियों पर व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी डालने और अवमानना कार्रवाई की बात कहने वाले निर्देश भी रद्द कर दिए गए। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया कि अवॉर्ड की राशि की वसूली की कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है।

क्या है पूरा मामला

मामला बस्तर जिले में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र की योजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग-63 के विभिन्न हिस्सों में दो लेन सड़क निर्माण परियोजना से जुड़ा है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने परियोजना के लिए पहले 169.23 करोड़ रुपए की प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति दी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 211.53 करोड़ रुपए कर दिया गया।

परियोजना की पूरी राशि केंद्र सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई थी, जबकि छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग को कार्यान्वयन एजेंसी बनाया गया था। ठेकेदार ने निर्धारित कार्य पूरा कर 30 जून 2019 को निर्माण कार्य समाप्त कर दिया। इसके बाद उसने करीब 190.33 करोड़ रुपए के अतिरिक्त भुगतान का दावा किया, जिसे विभाग ने अस्वीकार कर दिया।

मध्यस्थ ने एकतरफा कार्रवाई के बाद दिया 160.30 करोड़ का अवॉर्ड

दावे को लेकर ठेकेदार ने मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू की। एकल मध्यस्थ की नियुक्ति के बाद राज्य की ओर से अधिकृत प्रतिनिधि और कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में मध्यस्थ ने एकतरफा कार्यवाही की। इसके बाद 2 सितंबर 2022 को 160 करोड़ 30 लाख 11 हजार 411 रुपए का अवॉर्ड पारित किया गया।

अवॉर्ड के बाद ठेकेदार ने इसकी वसूली के लिए वाणिज्यिक न्यायालय में निष्पादन प्रकरण दायर किया।

अवॉर्ड को चुनौती की कोशिशें समय-सीमा में खारिज

राज्य सरकार ने मध्यस्थता अवॉर्ड को चुनौती देने के लिए मध्यस्थता अधिनियम की धारा 34 के तहत आवेदन किया था, लेकिन समय-सीमा के कारण इसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद धारा 37 के तहत की गई चुनौती भी हाईकोर्ट ने 10 जून 2024 को खारिज कर दी।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने 19 जनवरी 2026 को 484 दिन की देरी के आधार पर विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी। इसके बाद अवॉर्ड की राशि की वसूली के लिए निष्पादन कार्यवाही आगे बढ़ी।

अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से बुलाने पर उठे सवाल

राशि के भुगतान में देरी होने पर निष्पादन न्यायालय ने लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए। 30 अप्रैल 2026 के आदेश में इंजीनियर-इन-चीफ और संबंधित मुख्य अभियंता से भुगतान की दिशा में उठाए गए कदमों और संभावित समय-सीमा की जानकारी मांगी गई।

विभाग से बैंक खातों, परियोजना खातों, प्राप्त राशि, उपलब्ध शेष धनराशि समेत अन्य वित्तीय विवरण भी मांगे गए।

इसके बाद 22 जून 2026 के आदेश में लोक निर्माण विभाग के सचिव, इंजीनियर-इन-चीफ और मुख्य अभियंता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अवॉर्ड की राशि के भुगतान की प्रक्रिया और समय-सीमा बताने को कहा गया। भुगतान नहीं होने की स्थिति में मामले को अवमानना कार्रवाई के लिए हाईकोर्ट भेजे जाने की संभावना भी जताई गई थी।

धारा 36 के तहत डिक्री की तरह होगी वसूली

हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता अवॉर्ड अब अंतिम रूप ले चुका है और उसकी वसूली कानून के अनुसार की जा सकती है। मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम की धारा 36 के तहत अवॉर्ड को उसी तरह लागू किया जाता है, जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत किसी डिक्री को।

हालांकि, निष्पादन न्यायालय को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के दायरे में ही कार्रवाई करनी होगी। वह ऐसे सरकारी अधिकारियों पर व्यक्तिगत देनदारी नहीं डाल सकता, जिन्हें मूल अवॉर्ड में व्यक्तिगत रूप से भुगतान के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है।

निजी शपथपत्र और अंडरटेकिंग लेने के निर्देश भी निरस्त

कोर्ट ने अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से भुगतान का वादा करने वाला शपथपत्र या अंडरटेकिंग लेने और भुगतान नहीं होने पर उन पर व्यक्तिगत ब्याज या वित्तीय जिम्मेदारी तय करने की चेतावनी को भी उचित नहीं माना।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अवॉर्ड किसी सरकारी विभाग या प्राधिकरण के खिलाफ है तो निष्पादन न्यायालय सक्षम अधिकारियों से विभाग की संपत्ति, उपलब्ध धनराशि, स्वीकृति और भुगतान के लिए किए गए प्रयासों की जानकारी मांग सकता है। इसके साथ कानून में उपलब्ध वसूली के तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

लंबित पुनर्विचार याचिका पर टिप्पणी से भी रोका

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल पुनर्विचार याचिका लंबित होने के आधार पर अवॉर्ड की वसूली नहीं रुकती। लेकिन निष्पादन न्यायालय को उस याचिका के सफल होने या असफल होने की संभावना पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

पीठ ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अधिकारियों से व्यक्तिगत शपथपत्र या अंडरटेकिंग लेने, उन पर निजी वित्तीय जिम्मेदारी डालने और केवल भुगतान नहीं होने के आधार पर अवमानना कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने संबंधी निर्देश निरस्त कर दिए। साथ ही अवॉर्ड की वसूली की कार्यवाही को मध्यस्थता अधिनियम की धारा 36 और सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 के तहत कानून के अनुसार जारी रखने की अनुमति दी।

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