खैरागढ़ में अवैध कॉलोनी मामला गरमाया: जांच के बाद भी कार्रवाई ठप, नगर पालिका की चुप्पी पर उठे सवाल

खैरागढ़। शहर में मेंटेनेंस खसरा और नजूल भूमि पर कथित अवैध कॉलोनी को लेकर विवाद अब केवल जमीन घोटाले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एसडीएम जांच में अवैध प्लाटिंग की पुष्टि और कलेक्टर कार्यालय के निर्देशों के बावजूद नगर पालिका की चुप्पी चर्चा का विषय बनी हुई है।
सिविल लाइन क्षेत्र की जमीन पर अवैध प्लाटिंग का मामला
मामला सिविल लाइन क्षेत्र स्थित प्लॉट नंबर 114 और 115 से जुड़ा है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह भूमि पहले एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और बाड़ी के रूप में दर्ज थी। आजादी से पूर्व इसे अल्फ्रेड पार्क के नाम से जाना जाता था।
बाद में इस जमीन के ऐतिहासिक स्वरूप में बदलाव हुआ और धीरे-धीरे यह टुकड़ों में बिकती चली गई। स्थानीय स्तर पर इस जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद की स्थिति बनी हुई है।
एक लाख वर्गफीट जमीन 22 हिस्सों में बंटी, कई बार हुई बिक्री
सरकारी जांच रिपोर्ट के अनुसार करीब एक लाख वर्गफीट से अधिक भूमि को लगभग 22 हिस्सों में बांटा गया। इन भूखंडों का 17 लोगों के नाम पर पंजीयन हुआ और कई हिस्सों की दोबारा बिक्री भी की गई।
वर्तमान में इस क्षेत्र में बड़े मकान, कॉम्प्लेक्स और निर्माणाधीन भवन खड़े हैं, जिससे मामला और भी जटिल हो गया है।
बिना वैध लेआउट के विकसित हुई कॉलोनी, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
नगर एवं ग्राम निवेश विभाग की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि इस भूमि का कोई वैध लेआउट स्वीकृत नहीं हुआ था। यानी कॉलोनी निर्माण की अनुमति आधिकारिक रूप से जारी ही नहीं की गई थी।
इसके बावजूद वर्षों तक रजिस्ट्री, नामांतरण और निर्माण कार्य जारी रहे, जिससे प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं, नगर पालिका की भूमिका पर सवाल
एसडीएम जांच रिपोर्ट कलेक्टर कार्यालय को भेजी जा चुकी है। इसके बाद नजूल शाखा ने मुख्य नगर पालिका अधिकारी को निर्देश जारी करते हुए छत्तीसगढ़ नगर पालिका कॉलोनाइजर नियमों के तहत कार्रवाई करने को कहा।
लेकिन अब तक न तो नोटिस जारी हुआ है, न ही किसी निर्माण पर रोक या कार्रवाई दिखाई दी है। यही कारण है कि नगर पालिका की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
कार्रवाई पर सस्पेंस, शहर में बढ़ी चर्चा
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि इतने स्पष्ट दस्तावेजों और आदेशों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर किसके प्रभाव में यह पूरा मामला अटका हुआ है।
शहर में यह भी तंज कसा जा रहा है कि यहां अवैध कॉलोनी बनाना नहीं, बल्कि उस पर कार्रवाई करना मुश्किल काम बन गया है।
प्रशासनिक निष्क्रियता पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था, भू-व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि सरकारी जमीन और पार्क जैसी संरक्षित भूमि पर बनी कथित अवैध कॉलोनी पर भी कार्रवाई नहीं होती, तो अन्य भूमि मामलों की सुरक्षा पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब पूरा शहर इस बात पर नजर लगाए बैठा है कि कार्रवाई पहले होती है या फिर मामला यूं ही फाइलों में दबा रह जाता है।




