छत्तीसगढ़

Bilaspur High Court: लोक आयोग की जांच रिपोर्ट आरटीआई से नहीं मिलेगी, हाईकोर्ट ने सूचना आयोग का आदेश किया रद्द

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार अधिनियम और छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि लोक आयोग की जांच से जुड़े दस्तावेज, साक्ष्य और गोपनीय अभिलेख आरटीआई के माध्यम से तब तक सार्वजनिक नहीं किए जा सकते, जब तक दोनों कानूनों के बीच स्पष्ट कानूनी टकराव साबित न हो। अदालत ने इस मामले में राज्य सूचना आयोग के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानून के विपरीत मानते हुए निरस्त कर दिया।

सिम्स भर्ती मामले से जुड़ा है पूरा विवाद

यह मामला वर्ष 2016 में लोक आयोग में दायर एक शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता संजीव कुमार ने सिम्स में वर्ष 2013-14 के दौरान हुई सीधी भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाया था। इसके बाद वर्ष 2018 में बिलासपुर निवासी सोमराज श्रीवास्तव ने आरटीआई के तहत शिकायत की प्रति, जांच की कार्रवाई और अंतिम आदेश की कॉपी मांगी।

लोक आयोग ने सूचना देने से किया था इनकार

लोक आयोग के जन सूचना अधिकारी ने मई 2018 में जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम, 2002 की धारा 14 के तहत जांच से जुड़े दस्तावेज गोपनीय होते हैं। साथ ही आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(जी) और 8(1)(एच) के तहत भी इस तरह की जानकारी सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है, क्योंकि इससे जांच प्रक्रिया और गवाहों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

बाद में प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने भी जन सूचना अधिकारी के फैसले को सही ठहराते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने गोपनीयता के प्रावधान को माना प्रभावी

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 22 अन्य कानूनों पर प्राथमिकता जरूर देती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लोक आयोग अधिनियम की धारा 14 के तहत मिली गोपनीयता स्वतः समाप्त हो जाती है। दोनों कानून अपने-अपने क्षेत्र में तब तक प्रभावी रहेंगे, जब तक उनके बीच कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष विरोधाभास न हो।

जांच पूरी होने के बाद भी नहीं खत्म होगी गोपनीयता

अदालत ने राज्य सूचना आयोग की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि जांच पूरी होने के बाद गोपनीयता का प्रावधान लागू नहीं रहेगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल जांच समाप्त हो जाने से गोपनीय अभिलेख स्वतः सार्वजनिक नहीं हो जाते। यदि कानून में गोपनीयता का संरक्षण दिया गया है, तो उसका पालन किया जाना अनिवार्य है।

राज्य सूचना आयोग का आदेश निरस्त

सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सूचना आयोग के आदेश को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि लोक आयोग को जांच से संबंधित गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश कानून के अनुरूप नहीं था। यह फैसला भविष्य में आरटीआई और विशेष अधिनियमों के बीच अधिकार क्षेत्र से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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